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नीम हकीम –

naam hakim comedy short story

A Comedy Short Story by Feroz Ahmed

सुबह घर से ऑफिस के लिए निकल ही रहा था कि दरवाज़े पर छींक आ गई।

पत्नी ने माथे पर हाथ रख लिया।

“लो, कर दिया न अपशगुन! कहीं इस बार भी प्रमोशन न रुक जाए। पड़ोस के शर्माजी को देखो, कैसे तरक्की पर तरक्की किए जा रहे हैं।”

अब छींक भी क्या मुझसे पूछकर आती! और मेरा प्रमोशन तो पिछले तीस साल से रुका हुआ था। हर बार दरवाज़े पर छींका होऊँ, ऐसा भी मुझे याद नहीं।

ऐसी बातों से मैं बेज़ार हूँ। मेरे घर और ससुराल में दकियानूसी सोच रखने वालों की भरमार है। मेरे साले साहब को ही ले लीजिए। पास ही रहते हैं। उस सुबह अपने काम पर जाने के बजाय मेरे घर नाश्ता कर रहे थे। रास्ते में काली बिल्ली ने उनका रास्ता काट दिया था। सोचा, थोड़ी देर बहन के यहाँ बैठकर निकलेंगे।

पेशे से वकील हैं। अक्सर मुझे सलाह देते हैं कि प्रमोशन न देने पर अपनी कंपनी के खिलाफ़ मुकदमा कर दूँ।

तीस साल की नौकरी में मैंने अपने अफ़सरों को शिकायत का मौका नहीं दिया। हर साल मेरी मेहनत की तारीफ़ होती थी, तनख़्वाह बढ़ती थी और प्रमोशन किसी दूसरे का हो जाता था। फिर भी सब ठीक ही चल रहा था। बस, कुछ साल पहले डायबिटीज हो गई थी। मैंने भी यह सोचकर तसल्ली कर ली कि बढ़ती उम्र में कुछ न कुछ तो लगा ही रहता है।

पिछली रात से तबीयत कुछ नरम थी। सुबह छींक आई तो पत्नी को प्रमोशन की चिंता हुई |

ऑफिस पहुँचा तो बड़े साहब ने अपने केबिन में बुला लिया। सामने की कुर्सी पर बैठाकर बड़े अपनापन से बोले, “देखो, तुम्हें डायबिटीज है। इस उम्र में आराम की ज़रूरत होती है। अब हम तुम्हें प्रमोशन देकर ज़िम्मेदारियाँ बढ़ा दें तो तुम्हारी सेहत पर असर पड़ेगा। इतने पुराने आदमी हो, तुम्हारा भी तो ख़याल रखना है।”

मैंने उनकी मेज़ पर रखी अपनी फ़ाइल की तरफ़ देखा।

उन्होंने बात पूरी की, “मेरी राय में तुम्हें वीआरएस ले लेना चाहिए।”

मैं अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया। तीस साल में पहली बार पता चला कि कंपनी मेरी तरक्की से ज़्यादा मेरी सेहत को लेकर परेशान है।

कुछ देर बाद दो-तीन छींकें और आईं। गले में खराश थी और बदन भी गर्म लग रहा था। बगल की मेज़ पर बैठे बंसल साहब ने फ़ाइल से नज़र उठाई।

“कल रात कुछ ठंडा खाया था?”

“नहीं तो।”

“ठीक से याद करो। आइसक्रीम, फालूदा?”

मैंने इनकार में सिर हिलाया।

“अचार? दही?”

दही खाया था। मैंने हामी भर दी।

उन्होंने फ़ाइल बंद कर दी। बीमारी की जड़ मिल गई थी।

चार बच्चों के बाप हैं बंसल साहब। छोटी-मोटी बीमारियाँ पहचानने का अच्छा-ख़ासा तजुर्बा है। शहर के तकरीबन सारे डॉक्टरों को जानते हैं। कौन कितनी फीस लेता है, कौन कितनी जाँचें लिखता है, सब उनकी ज़बान पर रहता है। हकीमों और वैद्यों की भी पूरी जानकारी रखते हैं।

उन्हें भी मेरी तरह डायबिटीज है, लेकिन उसकी चिंता मुझसे कहीं ज़्यादा करते हैं। जड़ी-बूटियों के इलाज के बड़े समर्थक हैं। कहते हैं, “डॉक्टरों की दवाइयाँ खाते रहो तो डायबिटीज बढ़ती ही जाती है।”

यह बात वह अक्सर अपने टिफ़िन के तीसरे डिब्बे से खीर या गुलाब जामुन खाते हुए कहते हैं।

दोपहर तक मेरी बेचैनी बढ़ गई। खाँसी भी आने लगी। बंसल साहब कुर्सी सरकाकर मेरे पास आए और धीमे से बोले, “ज़ुकाम है। लेकिन इसे मामूली मत समझना।”

मैंने रूमाल नाक से हटाकर उनकी तरफ़ देखा।

“डॉक्टर के पास जाओगे तो पाँच सौ फीस लेगा और दो सौ चालीस की दवा लिख देगा। मैं एक हकीम को जानता हूँ। पचास रुपये में ठीक कर देगा।”

पाँच सौ और पचास का फ़र्क़ सुनकर मुझे लगा कि बंसल साहब की हर बात को यूँ ही खारिज करना भी ठीक नहीं। आख़िर तजुर्बेकार आदमी हैं।

शाम को मैं उनके बताए दवाखाने के बाहर खड़ा था।

हकीम साहब ने मुझे देखा तो बीड़ी का आख़िरी कश लेकर उसे एक तरफ़ फेंक दिया। फिर हाथ हिलाकर अपने आसपास का धुआँ हटाया और मुस्कराते हुए बोले, “आइए, आइए।”

उनके पीछे काँच की बरनियों में तरह-तरह की जड़ी-बूटियाँ रखी थीं। उन्होंने एक बरनी खोली, उसमें से कुछ फाँका और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

“लीजिए, मुखवास है। सौंफ और मिश्री का चूरा। मुँह ताज़ा हो जाएगा।”

मैंने बरनी वापस रख दी और अपनी तकलीफ़ बताने लगा।

“कल रात से तबीयत कुछ नरम थी। आज सुबह से छींकें आ रही हैं। अब खाँसी और हल्का बुखार भी है।”

उन्होंने मेरी कलाई पकड़ ली। कुछ देर नब्ज़ देखते रहे, फिर पूछा, “और कोई बीमारी? शुगर वगैरह?”

“जी, डायबिटीज है।”

“अच्छा।”

उन्होंने पीछे से एक धूल भरी बरनी निकाली और उस पर हाथ फेरते हुए बोले, “यह मेरा सबसे नया नुस्खा है। खाते ही आराम मिलेगा।”

बरनी की धूल देखकर मैं कुछ पूछने वाला था, लेकिन तब तक उन्होंने चूरन की पुड़ियाँ बनानी शुरू कर दी थीं।

चार पुड़ियाँ मुझे थमाईं। फिर सुराही से गिलास में पानी भरकर आगे रख दिया।

“एक खुराक अभी ले लीजिए। घर पहुँचते-पहुँचते फ़र्क़ मालूम हो जाएगा।”

मैंने चूरन फाँका, पानी पिया और पचास रुपये का नोट उनकी तरफ़ बढ़ा दिया। बाकी पुड़ियाँ कमीज़ की ऊपर वाली जेब में रख लीं।

घर की ओर चलते हुए सचमुच फ़र्क़ महसूस होने लगा।

पहले क़दम कुछ लड़खड़ाए। फिर सिर घूमने लगा और पसीना आने लगा। किसी तरह घर के दरवाज़े तक पहुँचा। पत्नी को आवाज़ देना चाहता था, मगर उससे पहले ही आँखों के आगे अँधेरा छा गया।

गिरने से ठीक पहले मेरी नज़र साले साहब पर पड़ी। वह अब भी सोफ़े पर बैठे नमकीन खा रहे थे। शायद बिल्ली के रास्ता काटने का असर शाम तक रहता था।

जब होश आया तो मैं अपने बिस्तर पर था। मोहल्ले के डॉक्टर पास बैठे थे और कुछ पड़ोसी मुझे घेरे खड़े थे। पत्नी की आवाज़ सबसे ऊपर सुनाई दे रही थी।

बाद में मालूम हुआ कि मेरे गिरते ही उसने शोर मचाकर पड़ोसियों को बुला लिया था। शर्माजी डॉक्टर को ले आए थे। उन्होंने ब्लड शुगर जाँची थी। वह बहुत कम थी। उनके उपचार के बाद मेरी हालत सँभली थी।

गिरते वक़्त चूरन की पुड़ियाँ जेब से निकलकर फ़र्श पर बिखर गई थीं। पत्नी ने उन्हें उठाकर मेज़ पर रख दिया था। मुझे आँखें खोलते देखा तो एक पुड़िया सामने कर दी।

“यह कहाँ से लाए थे?”

मैंने हकीम का नाम बताया और बंसल साहब का भी।

“मुझे पहले ही शक था!” वह बोली। “सुबह से कह रही थी कि आज कुछ गड़बड़ होगी।”

डॉक्टर मुझसे पूछ रहे थे कि दिन में क्या खाया था, रोज़ की दवा कब ली थी और चूरन खाने के कितनी देर बाद चक्कर आए। पत्नी बीच-बीच में हकीम को कोस रही थी। साले साहब ने दवाखाने का पता लिखना शुरू कर दिया था।

शर्माजी मेरे पास खड़े थे। मुझे होश में देखकर उन्होंने राहत की साँस ली। मैंने भी उनका हाथ दबा दिया। मन में आया, बेचारे सोच रहे होंगे कि कुछ हो जाता तो कल छुट्टी लेनी पड़ती। बजट के दिनों में वैसे ही ऑफिस में इतना काम रहता है।

डॉक्टर ने मेज़ पर रखी पुड़ियों की तरफ़ देखा।

“अभी यह कहना मुश्किल है कि शुगर इतनी कम क्यों हुई। यह चूरन दोबारा मत लीजिएगा। और अपनी दवा में भी खुद कोई बदलाव मत कीजिएगा।”

मैंने सिर हिला दिया।

उन्होंने फिर समझाया, “शुगर कम हो जाने का मतलब डायबिटीज ठीक होना नहीं होता। यह बात याद रखिएगा।”

इतने में साले साहब ने पूछा, “उसने दवा की रसीद दी थी?”

मैंने कहा, “नहीं।”

उन्होंने ऐसे सिर हिलाया जैसे मुकदमे का सबसे मज़बूत सबूत मैंने खो दिया हो।

बंसल साहब को फ़ोन पर ख़बर मिली तो वह भी नाराज़ हो गए।

“अरे, वह तो नीम हकीम निकला!” उन्होंने कहा। “तुम चिंता मत करो। मेरी जानकारी में एक और हकीम है। उसके हाथ में बड़ा यश है।”

मैंने खाँसते हुए फ़ोन पत्नी को पकड़ा दिया।

कमरे में अब भी उसी हकीम की चर्चा हो रही थी। पत्नी उसे कोस रही थी, साले साहब उस पर मुकदमे की तैयारी कर रहे थे और डॉक्टर जाते-जाते फिर कुछ समझा रहे थे।

मेरा ध्यान बड़े साहब की बात पर अटका हुआ था। अब उनसे प्रमोशन की बात दोबारा करनी चाहिए। आराम करने की सलाह तो वह दे चुके थे। ज़ुकाम भी दो-चार दिन में चला ही जाएगा।

लेकिन उस दिन के बाद मेरा डायबिटीज ठीक होगयी । इस बात पर किसी का ध्यान ही नहीं गया ।

समाप्त

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