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Kashmakash

kashmakash short story

कशमकश | A short story by Mohd Gulshad

उस रात अम्मा ने बस इतना कहा था, “हो सकता है बेटा, भाई ने तेरे भले के लिए कहा हो।”

मैं उनकी तरफ़ देखता रह गया।

कुछ देर पहले बड़े भाई ने सबके सामने मुझे समझाया था कि मेरी परेशानियों की असली वजह मैं खुद हूँ। उनके मुताबिक मैं हर बात दिल पर लेता था, किसी से बनाकर नहीं रखता था और अपनी नाकामियों का दोष दूसरों को देता रहता था।

मैं चाहता था कि अम्मा एक बार कह दें, “बस करो, अभी परेशान है।”

लेकिन उन्होंने भाई का पक्ष ले लिया। कम से कम उस वक़्त मुझे यही लगा।

मैं उठकर अपने कमरे में आ गया। पीछे से अम्मा ने खाने के लिए आवाज़ दी। मैंने कह दिया कि भूख नहीं है।

भूख थी। बस चाहता था कि वह एक बार मेरे पीछे आएँ और पूछें कि बात क्या है। साथ ही डर भी था कि आईं तो मैं कुछ ऐसा कह दूँगा जिसका बाद में अफ़सोस होगा। दरवाज़े तक उनके कदमों की आहट सुनना चाहता था, मगर किसी से बात करने की हिम्मत नहीं थी।

बचपन से मुझे लगता आया था कि इस घर में मेरी कोई बात पूरी सुनी नहीं जाती। स्कूल में नंबर कम आए तो पहले डाँट पड़ी, फिर पूछा गया कि कम क्यों आए। कोई काम ठीक किया तो कहा गया कि इसमें कौन-सी बड़ी बात है। धीरे-धीरे मैंने बताना ही छोड़ दिया कि मेरे साथ क्या हो रहा है।

यह भी सच है कि कई बार मैं साधारण-सी बात में ताना ढूँढ़ लेता था। कोई हँसता तो लगता मुझ पर हँस रहा है। कोई चुप रहता तो लगता मुझसे नाराज़ है। मगर हर बार मेरा वहम भी नहीं होता था।

पढ़ाई किसी तरह पूरी हुई। नौकरी मिली तो लगा कि अब शायद कुछ बदल जाएगा। घर से बाहर मेरी अपनी पहचान होगी। वहाँ भी मैं वही सहमा हुआ आदमी निकला, जिसे जवाब आते हुए भी बोलने में देर लगती थी। बॉस सबके सामने डाँट देते और मैं घर लौटते हुए रास्ते भर सोचता रहता कि उस वक़्त मुझे क्या कहना चाहिए था।

जिस लड़की से मोहब्बत थी, उसकी शादी कहीं और हो गई। उसकी मजबूरियाँ थीं। मैं जानता था, फिर भी महीनों उसका आखिरी संदेश पढ़ता रहा। कभी उसे मिटाने के लिए फोन उठाता, फिर सोचता कि इसके बाद मेरे पास बचेगा क्या।

इन सब बातों के बीच अम्मा थीं। रात को देर से आता तो खाना गरम कर देतीं। सिर दुखता तो बिना पूछे तेल की शीशी ले आतीं। मुझसे हमेशा ठीक तरह बात न कर पातीं, लेकिन उनके पास बैठकर कभी-कभी लगता था कि अभी सब खत्म नहीं हुआ।

उस रात मुझे लगा, वह जगह भी चली गई।

कमरे के बाहर बर्तनों की आवाज़ आ रही थी। किसी ने टीवी चला दिया था। मैं बिस्तर के किनारे बैठा सुनता रहा। कितनी आसानी से सब अपने काम में लग गए थे। मुझे लगा, मेरे न होने पर भी यही होगा। दो-चार दिन रो लेंगे, फिर ज़िंदगी चलती रहेगी।

मैंने लोगों को किसी की मौत के तीसरे दिन हँसते हुए देखा था। उस वक़्त यह नहीं सोचा था कि शायद थोड़ी देर पहले वही लोग अकेले में रोए हों। उस रात तो मुझे हर बात अपने खिलाफ़ ही दिखाई दे रही थी।

मैंने दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।

कुछ देर कुंडी पर हाथ रखे खड़ा रहा। बाहर जाकर अम्मा के पास बैठ सकता था। उनसे कह सकता था कि मेरी हालत ठीक नहीं है। मगर फिर भाई की बातें याद आईं। लगा, दोबारा वही सवाल होंगे, वही समझाना होगा और मैं फिर अपनी बात नहीं कह पाऊँगा।

मैं दरवाज़े से हट गया।

उसी हड़बड़ी और गुस्से में मैंने एक ज़हरीली चीज़ निगल ली।

कुछ देर मैं बैठा रहा। कमरे में सब वैसा ही था। मेज़ पर सुबह का खाली कप रखा था। कुर्सी पर दफ़्तर की कमीज़ पड़ी थी। पंखे से बीच-बीच में खट की आवाज़ आती थी, जिसे ठीक करवाने के लिए अम्मा कई दिन से कह रही थीं।

पता नहीं मैंने क्या सोचा था। शायद यह कि एकदम से सब शांत हो जाएगा।

लेकिन मेरे भीतर घबराहट बढ़ने लगी।

मैं लेट गया और तकिए में मुँह छिपा लिया।

अब किसी को मुझसे शिकायत नहीं होगी।

यह सोचते ही अम्मा का चेहरा सामने आ गया।

पहले उनका वही चेहरा दिखा, जो खाने की मेज़ पर था। थका हुआ, थोड़ा परेशान। फिर जाने क्यों बरसों पुरानी एक बात याद आई।

हमारे मोहल्ले का एक लड़का सड़क हादसे में मर गया था। मैं घर आकर अम्मा को बता रहा था कि वहाँ कितनी भीड़ थी, पुलिस कैसे लोगों को हटा रही थी। अम्मा ने मेरी पूरी बात भी नहीं सुनी थी। उनके मुँह से निकला था, “हाय, उसकी माँ का क्या होगा।”

उस रात पहली बार मुझे उस लड़के की माँ की जगह अपनी अम्मा दिखाई दीं।

सुबह वह दरवाज़ा खटखटाएँगी।

मैं नहीं खोलूँगा।

फिर ज़ोर से आवाज़ देंगी।

मेरे पेट में डर की एक गाँठ पड़ गई।

मैं उठकर बैठा। अम्मा की दवाइयों का डिब्बा याद आया। पिछले महीने डॉक्टर ने उन्हें परेशान न होने की सलाह दी थी और वह घर आकर उसी बात पर हँसी थीं, “अच्छा, अब परेशानी भी पूछकर आया करेगी।”

मैं रो पड़ा।

“या अल्लाह, मैंने क्या कर दिया।”

कुछ ही देर पहले मैं चाहता था कि अम्मा को पता चले, उन्होंने मुझे कितना दुख दिया है। अब यह खयाल ही बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि उन्हें मेरे कमरे में क्या देखना पड़ेगा।

मुझे उनसे शिकायत थी। फिर भी उस वक़्त उन्हीं को पुकारना चाहता था।

मैंने बिस्तर से उतरने की कोशिश की। सिर चकराया तो दोबारा बैठ गया। फोन मेज़ पर रखा था। उसे उठाया, मगर उँगलियाँ काँप रही थीं।

अम्मा का नंबर सामने था। मैं उसे देखता रहा।

बताऊँगा तो क्या होगा? भाई क्या कहेंगे? अम्मा कैसे सहेंगी?

फिर अपने ही इन सवालों से डर लगा। अभी भी मैं यही सोच रहा था कि लोग क्या कहेंगे, जबकि मुझे मदद चाहिए थी।

मैंने फोन मिला दिया।

बाहर उनके फोन की घंटी सुनाई दी।

“हाँ बेटा?”

उनकी आवाज़ सुनते ही मेरा गला बंद हो गया।

“क्या हुआ? कमरे से फोन क्यों कर रहा है?”

“अम्मा… यहाँ आओ।”

“आ रही हूँ।”

मैंने फोन छोड़ दिया और किसी तरह दरवाज़े तक पहुँचा। कुंडी खोलते ही दीवार का सहारा लेकर नीचे बैठ गया।

अम्मा सामने थीं।

“अरे, क्या हुआ?”

उन्होंने झुककर मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया।

एक पल को मन हुआ कह दूँ कि चक्कर आ गया है। उन्हें कुछ न बताऊँ। शायद अपने आप ठीक हो जाऊँ। शायद अभी भी वह बात छिपाई जा सकती हो जो मैंने कर दी थी।

फिर साँस के साथ एक टूटी हुई सिसकी निकली।

“अम्मा, मैंने ज़हर खा लिया है।”

उनके हाथ मेरे चेहरे पर ठहर गए।

“क्या?”

मैंने नज़रें झुका लीं।

“मुझे बचा लो।”

अम्मा ने इतनी ज़ोर से भाई को पुकारा कि मैं सहम गया। फिर घर में एक साथ कई आवाज़ें उठीं। भाई आपातकालीन मदद के लिए फोन कर रहे थे। भाभी कमरे का रास्ता खाली कर रही थीं। अम्मा बार-बार मुझसे पूछ रही थीं कि मैंने क्या लिया है। मैंने मेज़ की तरफ़ इशारा किया।

आगे की बातें मुझे टुकड़ों में याद हैं।

भाई का मेरे पास बैठना। अम्मा का मेरा नाम पुकारते रहना। मदद के लिए आए लोगों के सवाल। घर से बाहर निकलते हुए ठंडी हवा का चेहरे पर लगना।

मैं अम्मा का हाथ छोड़ना नहीं चाहता था।


जब ठीक से होश आया तो मेरे ऊपर घर की छत नहीं थी।

सफ़ेद रोशनी आँखों में चुभ रही थी। पास कहीं मशीन की आवाज़ आ रही थी। मैंने हाथ हिलाना चाहा तो किसी ने धीरे से रोक दिया।

“लेटे रहिए।”

एक नर्स मेरे पास खड़ी थीं।

मैंने इधर-उधर देखा।

“अम्मा?”

“बाहर हैं। बुलाते हैं। अभी उठिए मत।”

मैंने आँखें बंद कर लीं।

मैं ज़िंदा था।

राहत के साथ ऐसी शर्म महसूस हुई कि अम्मा के आने से डर लगने लगा। उनका सामना कैसे करूँगा? क्या कहूँगा? वह पूछेंगी कि मैंने उनके बारे में एक बार भी क्यों नहीं सोचा, तो क्या जवाब दूँगा?

मन हुआ नर्स को रोक दूँ। कह दूँ कि अम्मा को अभी न बुलाएँ। फिर बाहर किसी के चलने की आवाज़ आई तो गर्दन घुमाकर दरवाज़े की तरफ़ देखने लगा।

कुछ देर बाद उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखा।

उनका दुपट्टा सिर से खिसका हुआ था। आँखें सूजी हुई थीं। मुझे देखते ही उनके होंठ काँपे, मगर उन्होंने खुद को सँभाल लिया।

“अम्मा…”

“अभी मत बोल।”

उन्होंने मेरे बाल ठीक किए। फिर कुर्सी खींचकर बैठ गईं।

मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।

“माफ़ कर दो।”

वह कुछ देर मेरी उँगलियाँ सहलाती रहीं। फिर बोलीं, “इतनी तकलीफ़ थी तो मुझे बताया क्यों नहीं?”

मैं कहना चाहता था कि मैंने कई बार बताने की कोशिश की थी। फिर लगा, अभी यह कहूँगा तो उन्हें इल्ज़ाम लगेगा। मैं चुप रहा।

अम्मा ने मेरे चेहरे की तरफ़ देखा।

“कह दे बेटा।”

“मैं बोलता था तो सब समझाने लगते थे।”

उनकी आँखें भर आईं।

“मुझे भी बता देता।”

“उस रात बताया तो था।”

यह कहते ही मैं रोने लगा।

अम्मा ने नज़रें झुका लीं। कुछ देर बाद बोलीं, “मैंने तेरी बात पूरी नहीं सुनी।”

मैं उनका हाथ और कसकर पकड़े रहा।

“मुझे लगा आप भी मुझसे तंग आ गई हो।”

“तंग नहीं आई थी। मैं समझी, तुम दोनों की बहस खत्म करवा दूँ। मुझे क्या पता था तू मेरी बात का यह मतलब लेगा।”

मैं रोता रहा। वह मुझे चुप कराने की जल्दी नहीं कर रही थीं।

उस दिन हमारी बहुत लंबी बात नहीं हुई। मेरी तबीयत इसकी इजाज़त भी नहीं देती थी। लेकिन जितनी हुई, उतनी शायद कई साल में नहीं हुई थी।


अस्पताल में कुछ दिन रहना पड़ा। डॉक्टरों ने बताया कि होश आ जाना भर काफ़ी नहीं था। जाँच और निगरानी जरूरी थी।

एक दिन मानसिक स्वास्थ्य के डॉक्टर भी मिलने आए। उन्होंने कुछ देर अम्मा और भाई को बाहर बैठने के लिए कहा।

शुरू में मैं उनके सामने भी यही कहता रहा कि बस उस रात गुस्सा आ गया था।

उन्होंने पूछा, “और उससे पहले की रातों में नींद कैसी आती थी?”

मैं चुप हो गया।

फिर उन्होंने भूख के बारे में पूछा। दफ़्तर के बारे में। यह भी कि आखिरी बार किस काम में मन लगा था।

मैं जवाब देता, फिर कुछ छिपा लेता। डर था कि सब बता दिया तो वह मेरे बारे में क्या सोचेंगे। लेकिन हर बात छिपाने के बाद यह भी लगता था कि फिर यहाँ आने का फायदा क्या हुआ।

आखिर मैंने उन्हें उन रातों के बारे में बताया जब सुबह होने तक नींद नहीं आती थी। उन दिनों के बारे में भी, जब दफ़्तर जाने के लिए कपड़े पहनकर बैठा रहता और बाहर निकलने की हिम्मत नहीं होती।

बात करते-करते मुझे एहसास हुआ कि मैं सिर्फ उस रात से परेशान नहीं था। बहुत समय से ठीक नहीं था। मैंने अपनी हालत को कभी आलस कहा था, कभी कमजोरी, कभी खराब किस्मत।

उन्होंने मेरी बात सुनी। इलाज और आगे की मुलाकातों के बारे में समझाया। मैंने पहली बार किसी से साफ़ कहा कि मुझे मदद चाहिए।

भाई जब दोबारा अंदर आए तो कुछ देर खिड़की के पास खड़े रहे।

फिर बोले, “ऑफिस में छुट्टी की बात कर दी है।”

मैंने सिर हिला दिया।

वह मेरे बिस्तर के पास आकर बैठ गए।

“मुझे उस तरह नहीं बोलना चाहिए था।”

मुझे उनकी तरफ़ देखने में मुश्किल हो रही थी। उनकी बात सुनकर अच्छा भी लगा था और पुराना गुस्सा भी उठ रहा था।

“अभी इस पर बात नहीं कर पाऊँगा,” मैंने कहा।

“ठीक है।”

उस दिन उन्होंने आगे कोई नसीहत नहीं दी। मेरे लिए यह भी नई बात थी।


घर लौटकर अपने कमरे में कदम रखा तो डर लगा।

मेज़ साफ़ थी। कप वहाँ नहीं था। कमीज़ धुलकर अलमारी में रख दी गई थी। पंखे की खटखट भी बंद थी।

मैं दरवाज़े के पास खड़ा रहा।

अम्मा पीछे से आईं।

“बैठेगा नहीं?”

मैं बिस्तर पर बैठ गया। वह मेरे पास बैठीं तो मैंने धीरे से अपना सिर उनकी गोद में रख दिया।

बचपन में भी ऐसे ही लेटता था। वह बालों में उँगलियाँ फेरती रहतीं और घर के छोटे-छोटे काम गिनाती रहतीं। कभी कहतीं, “बड़ा होकर मुझे बहुत घुमाना,” कभी कहतीं, “तू ही तो मेरी उम्मीद है।”

मैंने उनकी साड़ी का किनारा उँगलियों में पकड़ लिया।

“आपको याद है, आप कहती थीं मैं आपकी उम्मीद हूँ?”

“अब भी है।”

मैं कुछ देर चुप रहा।

“मगर अम्मा, मैं अभी बहुत थका हुआ हूँ।”

उनका हाथ एक पल को रुका, फिर मेरे सिर पर चलने लगा।

“तो आराम कर। मैंने कब कहा अभी सब कर दे?”

मेरे होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

खिड़की के बाहर सब्ज़ी वाले की आवाज़ आ रही थी। रसोई में भाभी कुछ रख रही थीं। घर की वही रोज़ की आवाज़ें थीं। उस रात इन्हीं आवाज़ों को सुनकर मुझे लगा था कि यहाँ मेरी कोई जगह नहीं है।

मैंने अम्मा की तरफ़ देखा। वह थकी हुई थीं। उनकी परेशानी सिर्फ मेरे ठीक कह देने से खत्म नहीं होनी थी। मेरी अपनी परेशानी भी अभी बाकी थी। दफ़्तर लौटने का खयाल डराता था। कुछ बातें याद आते ही सीना भारी होने लगता था।

अब भी मन में कशमकश थी। किसी से बात करने को जी चाहता तो अगले ही पल चुप हो जाने का मन करता। भाई की माफ़ी याद आती तो उनकी पुरानी बातें भी याद आने लगतीं। आगे के बारे में सोचता तो उम्मीद के साथ डर भी उठता।

फर्क इतना था कि अब डॉक्टर से अगली मुलाकात तय थी। अम्मा को मेरी हालत मालूम थी। और मुझे यह कहने में पहले से थोड़ी कम शर्म आ रही थी कि मैं ठीक नहीं हूँ।

“अम्मा?”

“हूँ?”

“कल सुबह थोड़ी देर बाहर चलेंगे?”

“कहाँ?”

“बस नीचे तक। मन हुआ तो आगे।”

उन्होंने मेरे माथे पर हाथ रखा।

“चलेंगे।”

कुछ देर बाद वह उठने लगीं तो आदतन मैं उन्हें जाने देने वाला था। घर में काम होगा। मेरी वजह से वैसे ही कई दिन परेशान रही हैं।

फिर मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।

“अभी थोड़ी देर और बैठो।”

वह फिर बैठ गईं।

इस बार मैंने अपनी बात अधूरी नहीं छोड़ी थी।

समाप्त

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