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Hindi short story – Nayi Nasal

hindi short story - nayi nasal

शहर की शाम धीरे-धीरे रात में बदल रही थी। बाज़ार की तंग गलियों में लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। दुकानों के बाहर लगी रोशनियाँ चमकने लगी थीं और हर तरफ़ शोरगुल था।

उन्नीस साल का आरव पिछले एक घंटे से एक ही गली में भटक रहा था। वह पहली बार इस शहर में आया था और उसे अपने रहने के लिए एक पीजी का कमरा ढूँढ़ना था। उसकी जेब में एक कागज़ था, जिस पर पीजी का पता लिखा हुआ था।

वह कभी मोबाइल देखता, कभी कागज़ और कभी सामने से गुज़रते लोगों को रोककर पूछता।

“भाई साहब, ये मकान नंबर 27 कहाँ है?”

“पता नहीं!”

“अंकल, यहाँ कहीं शर्मा पीजी है?”

“बेटा, आगे जाकर पूछ लो।”

आरव के चेहरे पर परेशानी साफ़ दिखाई दे रही थी। कंधे पर बैग था, माथे पर पसीना और कदमों में बेचैनी।

तभी उसकी नज़र सड़क किनारे एक छोटी-सी चाय की दुकान पर पड़ी। दुकान के बाहर एक बूढ़ा गोविंद काका लकड़ी के स्टूल पर बैठा चाय पी रहा था। हाथ मैं अख़बार था | उसकी उम्र करीब साठ साल होगी। सफेद बाल, झुर्रियों से भरा चेहरा और आँखों पर मोटा चश्मा। अख़बार पड़ते हुए पलट कर चाय वाले से कहता है “क्या ज़माना आगया है | यह आजकल के नौजवान video बना बना कर कुछ भी बोलते है | एक लड़की ने अपने दादा सामान नेता को गाली दे दी | “

चाय वाला अपनी चाय बनाने मैं मगन था | गोविद काका फिर अख़बार पढने मैं लग गए |

आरव तेज़ी से उनके पास पहुँचा।

“अंकल, ज़रा ये पता बता देंगे? मैं कब से ढूँढ़ रहा हूँ। किसी को कुछ मालूम ही नहीं है।”

उसने कागज़ उनके सामने कर दिया।

गोविंद काका ने चश्मा ठीक किया और पते को ध्यान से देखा। फिर बिना कुछ बोले अपना हाथ उठाकर सामने वाली गली की ओर इशारा किया।

“उस तरफ़ जाओ। फिर बाईं तरफ़ मुड़ना। आगे एक पुरानी बिल्डिंग मिलेगी। उसी के पास है।”

“पक्का?”

बूढ़े आदमी ने सिर हिलाया।

आरव ने जल्दी से कागज़ जेब में रखा और उस दिशा में चल पड़ा।

वह भीड़ में गायब हो गया।

गोविंद काका ने फिर अपनी चाय उठाई और सड़क की तरफ़ देखने लगे। कुछ देर बाद उठकर अपने घर की तरफ चल दिया |

अगले दिन।

शाम का वही समय था। बाज़ार में फिर वही भीड़ थी। चाय की दुकान पर कुछ लोग बैठे थे और गोविंद काका अपने पुराने स्टूल पर आकर बैठ चुके थे।

तभी उनकी नज़र दुकान के सामने खड़े एक नौजवान पर पड़ी।

वह इधर-उधर देख रहा था, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो।

गोविंद काका ने उसे गौर से देखा।

फिर अचानक उनकी आँखें फैल गईं।

“अरे! तुम?”

आरव ने उनकी तरफ़ देखा और मुस्कुरा दिया।

“जी, अंकल!”

“तुम वही हो न, जो कल मुझसे किसी पते के बारे में पूछ रहे थे?”

“जी, बिल्कुल।”

“मिल गया था पता?”

“जी अंकल, मिल गया था।”

गोविंद काका ने चाय का कप नीचे रखा।

और उसे देखने लगे। लड़के के चेहरे पर एक अलग ही भाव था | वह न तो परेशान लग रहा था, न ही किसी जल्दी में।

“क्या बात है?  किसी का इंतज़ार कर रहे हो?”

“जी।”

“किसका?”

आरव ने उनकी तरफ़ देखा।

“आपका ही इंतज़ार कर रहा था ।”

गोविंद काका कुछ पल उसे देखते रहे।

“मेरा?”

“जी, आपका।”

आरव ने मुस्कुराते हुए कहा,

“अंकल। कल हम जब मिले थे।“

आरव ने दुकान के बाहर पड़े एक खाली स्टूल की तरफ़ देखा।

“अंकल, बैठ जाऊँ?”

“हाँ, हाँ, बैठो।”

आरव बैठ गया।

गोविंद काका अब भी उसे सवालिया नज़रों से देख रहे थे।

आरव ने एक गहरी साँस ली।

“अंकल, कल जब मैं आपसे मिला था, तब मैं बहुत परेशान था। नया शहर था, रहने की जगह नहीं मिल रही थी और ऊपर से शाम हो रही थी।”

“हाँ, याद है।”

“आपने मुझे रास्ता बताया और मैं जल्दी-जल्दी वहाँ से चला गया।”

“तो?”

“और मुझे थोड़ी देर बाद मेरी गलती का अहसास हुआ | तोह मैं वापस आया था।”

“अच्छा?”

“जी। लेकिन तब तक आप जा चुके थे।”

गोविंद काका ने चाय का कप उठाया।

“गलती | कैसी गलती ?”

“फिर मैंने दुकान वाले से आपके बारे में पूछा। उसने बताया कि आप रोज़ इसी समय यहाँ आते हैं।”

“हाँ “

“तो आज मैं फिर आ गया।”

गोविंद काका के चेहरे पर अब उत्सुकता थी।

“क्या गलती हुई और मुझसे मिलना क्यों चाहते थे? “

आरव कुछ पल चुप रहा।

उसने सामने सड़क की तरफ़ देखा। फिर अपनी जेब से कल वाला कागज़ निकाला और उसे मोड़कर वापस रख लिया।

“कल आपने मेरी मदद की थी। और मैं…मैं आपको “Thank You” बोले बिना चला गया | मैं आपको इस बात के लिए sorry बोलना चाहूँगा और कल मेरी मदत करने के लिए thank you भी”

गोविन्द काका सोच मैं पड़ गए और फिर मुस्कुरा दिए | यह सोच कर के इस नयी नसल को समझना मुश्किल है |

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