फ़ाइल के पहले पन्ने पर नई तारीख़ थी—अक्टूबर, 2026। उसके नीचे लगे काग़ज़ चालीस साल पुराने थे।
राघव मेहता ने सावधानी से पन्ना पलटा। किनारे से थोड़ा काग़ज़ झड़कर मेज़ पर गिर गया।
“निर्मलपुर औद्योगिक परियोजना,” उप-निदेशक सिन्हा ने कहा। “सन छियासी में किसानों से ज़मीन ली गई थी। रिकॉर्ड में मुआवज़ा बँट चुका है। शिकायत है कि कुछ किसानों को मिला ही नहीं।”
“अब जाँच हो रही है?”
“पहले भी हुई थी। बंद हो गई। एक महिला अर्ज़ियाँ देती रही। इस बार मामला हाईकोर्ट तक पहुँचा है।”
राघव अट्ठाईस साल का था। राज्य राजस्व विभाग की सतर्कता शाखा में आए उसे दो साल हुए थे। अब तक उसके हिस्से ऐसे मामले आए थे, जिनमें ग़लती ढूँढ़ना मुश्किल नहीं था; मुश्किल यह तय करना होता था कि उसे कितनी साफ़ भाषा में लिखा जाए।
सिन्हा ने फ़ाइल के ऊपर दौरे का आदेश रख दिया।
“तीन दिन में शुरुआती रिपोर्ट चाहिए। पुराने रिकॉर्ड की हालत देखो। आगे जाँच का कोई आधार बचा भी है या नहीं।”
फिर उन्होंने कुर्सी पर पीठ टिका दी।
“चालीस साल हो गए हैं, राघव। हर पुरानी शिकायत में कुछ निकलना ज़रूरी नहीं।”
राघव ने उत्तर नहीं दिया।
सोचते समय वह जेब में रखा सिक्का अँगूठे और तर्जनी के बीच घुमाने लगा। सिक्का साधारण था। कई साल पहले पिता ने किसी यात्रा में दिया था। तब से वह उसके पास रहता था।
सिन्हा की नज़र उसके हाथ पर गई।
“यह आदत छोड़ो। ध्यान भटकता है।”
राघव ने सिक्का जेब में रख लिया और फ़ाइल उठा ली।
निर्मलपुर में तहसील अब भी पुराने भूमि एवं औद्योगिक विकास कार्यालय के एक हिस्से से चलती थी। बाक़ी इमारत की खिड़कियों पर धूल जमी थी और बरामदे की छत से जगह-जगह पलस्तर झड़ चुका था।
फाटक पर ऑटो रुका तो राघव ने मुख्य सीढ़ियों की ओर देखा।
बीच की एक सीढ़ी गहरी घिसी हुई थी।
उसे अचानक लगा कि दाईं ओर का संकरा रास्ता पीछे के आँगन में निकलता होगा। आँगन में एक कुआँ होगा—लोहे की जाली से ढका हुआ।
“पीछे का रास्ता खुला है?” उसने चौकीदार से पूछा।
“नहीं साहब। बरसों से बंद है।”
राघव कुछ पल वहीं खड़ा रहा।
उसे पीछे जाने की ज़रूरत ही क्या थी?
दफ़्तर में परिचय और काग़ज़ी औपचारिकताएँ पूरी होते-होते शाम हो गई। पुराने अभिलेख अगले दिन निकाले जाने थे।
उस रात सर्किट हाउस में उसने सपना देखा।
एक लंबा बरामदा था। वह बाहर खड़ा था। भीतर किसी कमरे में पंखा चर्र-चर्र करता घूम रहा था। दरवाज़े की चौखट के पार एक आदमी की पीठ दिखाई दे रही थी।
मेज़ के सामने एक बूढ़ा किसान हाथ में मुड़ा हुआ काग़ज़ लिए खड़ा था।
“साहब, अँगूठा मेरा नहीं है।”
कुर्सी पर बैठे आदमी ने सिर तक नहीं उठाया।
“फ़ाइल में भुगतान हो चुका है।”
“पर पैसे—”
“अगले आदमी को भेजो।”
राघव की नींद खुल गई।
कमरे का पंखा भी चर्र-चर्र कर रहा था।
उसने पानी पिया और देर तक अँधेरे में बैठा रहा। फिर अपने आप से कहा—दिन भर जो पढ़ा था, नींद में वही दिखा है।
अगली सुबह अभिलेख कक्ष खुलवाने के लिए गोविंद काका को बुलाया गया।
अठहत्तर साल के काका इसी दफ़्तर में चपरासी रहे थे। अब पेंशन के काम या पुराने परिचितों से मिलने कभी-कभी आ जाते थे। पुराने रिकॉर्ड के बारे में उनसे अधिक किसी को जानकारी नहीं थी।
क्लर्क ने चाबियों का गुच्छा उनकी ओर बढ़ाया।
काका ने नज़र उठाई तो राघव दरवाज़े की चौखट पर खड़ा था—एक हाथ जेब में, कंधा ज़रा टेढ़ा किए, अँगूठा जेब के भीतर किसी चीज़ पर घूमता हुआ।
काका वहीं ठिठक गए।
“क्या हुआ?” क्लर्क ने पूछा।
“कुछ नहीं।”
उन्होंने सही चाबी चुनी और आगे चल दिए।
अभिलेख कक्ष में सीलन की गंध थी। अलमारियों पर चूने के धब्बे पड़े थे। काका ने ऊपर की एक शेल्फ़ की ओर इशारा किया।
“परियोजना वाली फ़ाइलें वहाँ होंगी।”
राघव ने काम शुरू किया।
अधिग्रहण रजिस्टर में रामधन सहित कई किसानों के नामों के आगे लिखा था—भुगतान पूर्ण।
साथ की सूची में भुगतान चेक द्वारा किए जाने का उल्लेख था, पर संबंधित खाने ख़ाली थे। दूसरी फ़ाइल में नक़द निकासी के अभिलेख थे। भुगतान की रसीदों पर अँगूठों के निशान लगे थे।
केवल इससे ग़बन साबित नहीं होता था। भुगतान की व्यवस्था बदली भी जा सकती थी। लेकिन बदलाव का आदेश नहीं मिल रहा था।
फिर उसे रामधन की शिकायत मिली।
रसीद पर लगा अँगूठा मेरा नहीं है। मुझे कोई धन नहीं दिया गया है।
राघव ने पन्ना दोबारा पढ़ा।
रात के सपने में भी यही बात थी।
उसने अपनी नोटबुक में शिकायत की तारीख़ लिखी और कुछ देर कलम रोके बैठा रहा। संभव था, यही वाक्य उसने पिछली शाम फ़ाइल में सरसरी तौर पर पढ़ लिया हो।
जाँच बंद करने वाली टिप्पणी के नीचे नाम था—देवेन्द्र सहाय, विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी।
थोड़ी देर बाद पुराने कार्यालय की एक वार्षिक विवरणिका मिली। उसमें कर्मचारियों का समूह-चित्र छपा था। बीच में मोटे चश्मे वाला एक अधेड़ आदमी बैठा था।
नीचे वही नाम था।
“इनका क्या हुआ?” राघव ने पूछा।
काका ने तस्वीर देखी।
“सत्तानवे में गुज़र गए।”
“आप इनके समय यहाँ थे?”
“जी।”
“इस भुगतान के बारे में कुछ याद है?”
काका ने अलमारी की ओर देखा।
“बहुत पुरानी बात है, साहब।”
दोपहर में रिकॉर्ड की सूची बनवाते समय राघव की नज़र अभिलेख कक्ष के पिछले दरवाज़े पर पड़ी। उस पर जंग खाया ताला लटका था, पर चाबी उसी गुच्छे में निकली। आगे से बंद वह रास्ता यहीं से जुड़ता था।
दरवाज़ा खुलवाकर राघव बरामदे के पीछे निकल गया।
आँगन में एक सूखा कुआँ था।
उस पर लोहे की जाली लगी थी।
कमला देवी ने दरवाज़ा खोला तो उनके हाथ में आटा लगा था।
उन्होंने हाथ धोए, एक कुर्सी निकाली और राघव को बैठने को कहा।
“आपको फिर वही सब बताना पड़ेगा?” उन्होंने पूछा।
“जो काग़ज़ में नहीं है, वह भी।”
कमला कुछ देर चुप रहीं।
“ज़मीन गई तब मैं बारह साल की थी। बाबूजी को कहा गया, पैसे मिलेंगे तो दूसरी जगह खेत ले लेना। फिर कहा गया, अगले महीने आना। उसके बाद कहा गया कि पैसे तो मिल चुके।”
अलमारी से उन्होंने कपड़े में बँधा एक पुलिंदा निकाला। उसमें अर्ज़ियों की प्रतियाँ थीं, डाक की रसीदें थीं और कुछ छोटे-छोटे काग़ज़, जिन पर अलग-अलग तारीख़ें लिखी थीं।
“यह?”
“बाबूजी लिखवाकर लाते थे कि किस दिन गए, किससे मिले, क्या जवाब मिला। पढ़ना थोड़ा जानते थे। लिखने में हाथ नहीं चलता था।”
राघव ने एक काग़ज़ उठाया।
साहब दौरे पर हैं। सोमवार को आना।
दूसरे पर लिखा था:
साहब ने मिलने से मना किया।
“दो साल तक चक्कर लगाते रहे,” कमला ने कहा। “आख़िर में दफ़्तर खुलने से पहले जाकर सीढ़ियों पर बैठ जाते थे। कहते थे, कभी तो सामने पड़ेंगे।”
“फिर?”
“एक दिन वहीं गिर पड़े। लोग अस्पताल ले गए। शाम तक ख़बर आ गई।”
बाहर गली में सब्ज़ी वाले की आवाज़ सुनाई दी। कमला ने दरवाज़े की ओर देखा, फिर वापस राघव की ओर।
“तभी से लोग उन्हें रामधन की सीढ़ियाँ कहने लगे। दफ़्तर का नाम बदल गया। सीढ़ियों का नहीं बदला।”
राघव ने काग़ज़ क्रम से रखने शुरू किए।
“इनकी प्रतियाँ जाँच में लगाऊँगा। मूल आपके पास रहेंगे।”
“पहले भी लगाए थे।”
उसके हाथ रुक गए।
कमला का स्वर कठोर नहीं था। शायद इसी वजह से वह बात अधिक लगी।
“इस बार मैं हर शिकायत का रिकॉर्ड से मिलान करूँगा,” उसने कहा।
कमला ने उसे देखा।
“काग़ज़ तो तब भी बोलते थे, साहब। बस सुनने वाला कोई नहीं था।”
उस रात सपने में राघव बरामदे के बाहर नहीं था।
वह कुर्सी पर बैठा था।
सामने की मेज़ पर हरा कपड़ा बिछा था। मेज़ के दाएँ किनारे पर फूल-पत्तियों की नक्काशी थी, जिस पर उसकी कुहनी टिकी थी। चश्मे का किनारा नाक में चुभ रहा था। सामने खुली फ़ाइल में रामधन का नाम था। खिड़की से सीढ़ियों का एक हिस्सा दिखाई देता था।
बूढ़ा आज फिर आया था।
राघव ने उसे देखा और भीतर एक थकी हुई ऊब महसूस की—यह आदमी हार क्यों नहीं मानता?
मेज़ पर रखी चिट्ठी किसी बंसीलाल की थी।
बाक़ी हिस्सा पहुँच गया होगा। भुगतान वाली आपत्तियाँ अब नहीं उठनी चाहिए…
उसकी नज़र बाक़ी शब्दों पर ठहर नहीं पाई।
दरवाज़े पर आहट हुई। उसने चिट्ठी मोड़ दी।
“यह रख छोड़ी तो मुसीबत होगी,” किसी ने कहा।
राघव ने अपनी आवाज़ सुनी, पर बोलने का लहजा उसका नहीं था।
“मुसीबत उसकी होगी। मेरे पास रहेगी तो हिसाब नहीं भूलेगा।”
उसने निचली दराज़ पूरी बाहर खींची। भीतर लकड़ी के किनारे के नीचे उँगली फेरी।
एक पतली कील उसकी उँगली में चुभी।
वह हड़बड़ाकर जाग गया।
कुछ क्षण तक उसने अपनी उँगली कसकर पकड़ रखी। वहाँ कोई घाव नहीं था।
कमरे में चुप्पी थी।
उसे चिट्ठी से अधिक अपने भीतर की वह ऊब डरा रही थी।
सपने में सीढ़ियों पर बैठा आदमी उसे दुखी नहीं कर रहा था। वह उसके काम में बाधा था।
राघव उठकर आईने के सामने गया।
फिर वापस आकर उसने नोटबुक खोली और जो कुछ याद था, लिख दिया—मेज़, हरा कपड़ा, दराज़, लकड़ी का किनारा, कील, बंसीलाल।
नीचे समय दर्ज किया।
कुछ देर बाद उसने पन्ना बंद कर दिया।
अगली सुबह राघव ने पुराने अधिकारी के कमरे और उसमें बचे फ़र्नीचर का निरीक्षण करने को कहा। उसने गोविंद काका को भी बुलवा भेजा था; पुराने कमरों का हाल उनसे बेहतर कोई नहीं जानता था।
क्लर्क उसे इमारत के बंद हिस्से में ले गया।
“यह सामान नीलाम क्यों नहीं हुआ?” राघव ने पूछा।
“सूची बनी थी। फिर भवन की मरम्मत अटक गई। सामान यहीं पड़ा रहा।”
कमरे में टूटी कुर्सियाँ, लोहे के खाली रैक और एक भारी लकड़ी की मेज़ थी। उसके ऊपर पुरानी खिड़कियों के पल्ले रखे थे।
मेज़ देखते ही राघव का गला सूख गया।
सपने की मेज़ पर हरा कपड़ा बिछा था। असली मेज़ पर कपड़ा नहीं था, बस धूल थी। दाईं ओर की नक्काशी वही थी।
उसने क्लर्क से फ़र्नीचर का विवरण लिखने को कहा। निरीक्षण की तस्वीरें ली गईं। गोविंद काका दरवाज़े के पास खड़े थे।
निचली दराज़ फूली हुई थी। आसानी से नहीं खुली। बढ़ई बुलाना पड़ा।
जब दराज़ बाहर निकली, राघव झुक गया।
लकड़ी के भीतर एक छोटा-सा जंग लगा सिरा उभरा हुआ था।
उसने हाथ रोक लिया।
“यह पिछला तख़्ता अलग लगता है,” उसने बढ़ई से कहा। “सावधानी से देखिए।”
तख़्ते के पीछे एक उथला खाना था।
उसमें कपड़े की एक थैली मिली। भीतर कुछ भुरभुरे काग़ज़ और एक मुड़ा हुआ लिफ़ाफ़ा था।
राघव ने किसी को उन्हें अलग-अलग खोलने नहीं दिया। मिलने की जगह और हालत का विवरण बनवाया, उपस्थित लोगों के नाम दर्ज किए और सामग्री सुरक्षित रखवाई।
काग़ज़ों की बाद की जाँच में एक चिट्ठी पर बंसीलाल का नाम मिला।
लेकिन चिट्ठी कोई पूरा स्वीकारनामा नहीं थी। कुछ रकमों, तारीख़ों और “हिस्सा” पहुँचाने का उल्लेख था। साथ के एक पन्ने पर संक्षिप्त हिसाब था।
वह महत्वपूर्ण सुराग था। उसके अर्थ और प्रामाणिकता की पुष्टि अभी बाक़ी थी।
बरामदे में लौटते समय राघव ने जेब से सिक्का निकाला। उसे अँगूठे पर रखा, हल्का उछाला और हथेली में पकड़ लिया।
पीछे से काका की आवाज़ आई।
“साहब…”
राघव मुड़ा।
काका उसके हाथ को देख रहे थे।
“यह ऐसे ही करते थे।”
“कौन?”
काका ने बंद कमरे की ओर देखा।
“सहाय साहब। कोई इंतज़ार करता रहता था। वह सिक्का उछालते रहते थे।”
राघव ने हथेली बंद कर ली।
“आप कल से कुछ कहना चाह रहे हैं?”
काका की आँखें उससे हट गईं।
“मुझे घर जाना है।”
राघव ने रास्ता छोड़ दिया।
शाम को सिन्हा का फ़ोन आया।
“मुझे बताया गया है, तुमने पुराना फ़र्नीचर खुलवाया है।”
“निरीक्षण में कुछ काग़ज़ मिले हैं। रिकॉर्ड से मिलान करना होगा।”
“तीन दिन की शुरुआती जाँच को लंबा मामला मत बनाओ।”
“शुरुआती रिपोर्ट में आगे जाँच की सिफ़ारिश होगी।”
सिन्हा कुछ क्षण चुप रहे।
“बंसीलाल की फ़र्म अब बहुत बड़ी कंपनी है। अधूरे काग़ज़ों पर किसी का नाम लिखने से पहले सोच लेना।”
“इसीलिए सत्यापन माँग रहा हूँ।”
“तुम्हारी पोस्टिंग स्थायी नहीं है, राघव।”
फ़ोन कटने के बाद वह देर तक मेज़ के सामने बैठा रहा।
उसने सहाय की तस्वीर निकाली।
चेहरा उसके जैसा नहीं था। उम्र, बनावट, नाक—सब अलग। फिर भी उसे तस्वीर उलटकर रखनी पड़ी।
वह 1998 में पैदा हुआ था। सहाय की मृत्यु उससे एक साल पहले हुई थी।
यह केवल दो तारीख़ें थीं। इनके बीच संबंध बनाना आसान था। साबित करना असंभव।
वह सपनों को थकान, पढ़े हुए काग़ज़ों और संयोग से समझा सकता था। मगर मेज़ का छिपा खाना? पिछवाड़े का कुआँ?
उसने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट खोली।
एक ख़ाली जगह पर उसे अधिकारी का नाम लिखना था।
देवेन्द्र सहाय।
कलम काग़ज़ पर टिकी रही।
एक क्षण को मन में आया—नाम छोड़ दे। लिख दे, “तत्कालीन अधिकारी।” मामला आगे बढ़ेगा तो कोई और नाम जोड़ देगा।
वह तुरंत समझ गया कि वह क्या कर रहा है।
उसने पूरा नाम लिखा।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
गोविंद काका बाहर खड़े थे।
काफ़ी देर तक वे कुर्सी पर बैठे अपनी धोती का किनारा मरोड़ते रहे।
फिर बोले, “मैंने रामधन को कई बार लौटाया था।”
राघव चुप रहा।
“साहब भीतर होते थे। मुझसे कहलवाते थे कि बाहर गए हैं।”
“भुगतान के बारे में क्या जानते हैं?”
“एक शाम नक़दी के दो थैले कमरे तक पहुँचाए थे। किसको कितना मिला, अपनी आँखों से नहीं देखा। वह नहीं कहूँगा।”
“जो देखा, वही कहिए।”
काका ने पहली बार उसकी ओर सीधा देखा।
“दूसरे दिन रामधन आया था। मैंने कह दिया—तुम्हारा भुगतान हो गया, अब मत आना। मुझे नहीं मालूम था उसे मिला या नहीं। बस जो कहलवाया गया, कह दिया।”
उनका स्वर टूट गया।
“वह मुझसे बोला था, गोविंद, तू तो जानता है।”
कमरे में देर तक कोई नहीं बोला।
फिर काका ने पूछा, “मेरा नाम भी आएगा?”
“आपने जो किया और जो देखा, दोनों दर्ज होंगे।”
काका ने सिर झुका लिया।
“लिखिए।”
राघव ने शुरुआती रिपोर्ट में उपलब्ध रिकॉर्ड की विसंगतियाँ, मिले हुए काग़ज़ों का विवरण और गोविंद का बयान दर्ज किया।
उसने स्पष्ट लिखा कि अभी ग़बन का अंतिम निष्कर्ष देना संभव नहीं है, लेकिन जाँच बंद करने का आधार भी नहीं है।
आगे के लिए उसने भुगतान रसीदों के अँगूठों की विशेषज्ञ जाँच, उपलब्ध कोषागार अभिलेखों के मिलान, संबंधित फ़र्म के पुराने रिकॉर्ड की पड़ताल और जीवित किसानों तथा वारिसों के बयान लेने की सिफ़ारिश की।
कमला की अर्ज़ियाँ भी संलग्न थीं।
रिपोर्ट निर्धारित विभागीय माध्यम से जमा हुई। उसकी प्राप्ति संख्या राघव ने संभालकर रखी। न्यायालय के आदेश के अनुपालन का काम देख रही विधि शाखा को भी आधिकारिक रूप से प्रति भेजी गई।
सपनों का उसमें कोई उल्लेख नहीं था। नोटबुक का वह पन्ना भी उसने फ़ाइल में नहीं लगाया।
अगले कुछ सप्ताह में उससे दो बार स्पष्टीकरण माँगा गया। फिर अतिरिक्त जाँच के लिए टीम गठित हुई।
इस बीच उसका तबादला आदेश भी आ गया।
आदेश में प्रशासनिक आवश्यकता लिखी थी।
निर्मलपुर छोड़ने से पहले वह कमला देवी से मिलने गया। उनके सामने रिपोर्ट की वह प्रति रखी, जो उन्हें नियमानुसार दी जा सकती थी।
“अब पैसे मिल जाएँगे?” उन्होंने पूछा।
“अभी नहीं कह सकता। जाँच आगे बढ़ी है। उसमें समय लगेगा।”
“और आप?”
“मेरी दूसरी जगह पोस्टिंग हो गई है। अगली टीम को पूरा रिकॉर्ड सौंप दिया है।”
कमला ने काग़ज़ खोला। फिर चश्मा लेने भीतर गईं।
लौटकर उन्होंने उँगली रखते हुए धीरे-धीरे पहला पन्ना पढ़ा।
राघव की नज़र उनके हाथों पर थी। उसे अचानक लगा कि वह कुछ कह दे—अपना संदेह, अपने सपने, वह कमरा।
फिर वह चुप रहा।
कमला को उससे किसी पिछले जन्म का बयान नहीं चाहिए था। उन्हें इस जन्म में दिए गए जवाब का भरोसा चाहिए था।
“कुछ कहना है?” उन्होंने पूछा।
“नहीं।”
उन्होंने रिपोर्ट के आख़िरी पन्ने पर उसके दस्तख़त देखे।
“बाबूजी भी दस्तख़त पहचानते थे,” उन्होंने कहा। “कहते थे, यह नीचे नाम लिख दे तो हमारा काम हो जाए।”
राघव ने पहली बार बिना नज़र हटाए उनकी ओर देखा।
“इस पर मेरा नाम है,” उसने कहा। “जो जाँच मैंने की है, उसके बारे में आगे भी जवाब दूँगा।”
स्टेशन जाने से पहले वह दफ़्तर पर रुका।
सुबह का समय था। बरामदे में झाड़ू लग रही थी। कुछ लोग काग़ज़ों के पुलिंदे लेकर फाटक खुलने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
राघव बीच की घिसी हुई सीढ़ी पर बैठ गया।
सामने सड़क थी। सड़क के उस पार चाय की दुकान। ऊपर कमरे की खिड़की, जहाँ से नीचे बैठे आदमी का सिर दिखाई देता होगा।
उसने जेब से सिक्का निकाला।
कुछ देर उसे देखा। फिर सीढ़ी के किनारे रख दिया। किसी को इंतज़ार करवाने वाली यह आदत उसके साथ आगे नहीं जाएगी।
कोई उसे उठा लेगा। शायद चाय वाला, शायद कोई बच्चा। वह साधारण सिक्का था।
राघव उठ गया।
उस रात ट्रेन में उसे फिर वही बरामदा दिखाई दिया।
बूढ़ा किसान सीढ़ियों पर बैठा था। हाथ में मुड़ा हुआ काग़ज़ था।
इस बार राघव कमरे के भीतर नहीं था। वह नीचे, उसके पास खड़ा था।
बूढ़े ने काग़ज़ खोला। बहुत देर तक उसे देखा। फिर घुटनों पर हाथ रखकर धीरे से उठा, धोती झाड़ी और सड़क की ओर चल दिया।
राघव ने उसे पुकारना चाहा।
नींद खुल गई।
खिड़की के बाहर अँधेरे में किसी छोटे स्टेशन की बत्तियाँ पीछे छूट रही थीं।
उसने बगल में रखा बैग टटोला। रिपोर्ट की प्रति वहीं थी।
हिसाब पूरा नहीं हुआ था।
पर चालीस साल बाद पहली बार किसी ने उसे सचमुच सुना था।
समाप्त
